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6 साल पहले आज का दिन नि:शब्द कर गया था मुझे. अकेला कर गया था मेरा जिगर का टुकड़ा सुखदेव मुझे

कुछ लोग दुनिया से चले जाते हैं… लेकिन दिल से कभी नहीं जाते

स्वर्गीय श्री सुखदेव नानवानी जी की छठी पुण्यतिथि पर भावपूर्ण श्रद्धांजलि

आज मन बहुत भारी है…

छह वर्ष बीत गए, लेकिन ऐसा लगता है जैसे कल की ही बात हो। समय अपनी रफ्तार से आगे बढ़ता रहा, जिंदगी में बहुत कुछ बदला, बहुत से लोग आए और गए… लेकिन कुछ चेहरे ऐसे होते हैं, जिनकी याद समय के साथ धुंधली नहीं होती, बल्कि हर गुजरते साल के साथ और गहरी होती जाती है।

स्वर्गीय श्री सुखदेव नानवानी जी मेरे लिए सिर्फ एक दोस्त नहीं थे। वे मेरे उन चुनिंदा साथियों में से थे, जिनके साथ रिश्ता शब्दों का नहीं, बल्कि विश्वास, अपनापन और विचारों का था।

सुखदेव जी एक सच्चे, सरल, सेवाभावी और नेक इंसान थे। उनके व्यक्तित्व में दिखावा नहीं था। वे जो कहते थे, उसे निभाने की कोशिश करते थे और जो सही लगता था, उसके लिए खड़े रहने का साहस रखते थे।

उनका जुड़ाव आनंदपुर कुटिया, रायपुर से भी गहरा था। आनंदपुर ट्रस्ट और हमारे गुरु के प्रति उनकी श्रद्धा उनके जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा थी। कुटिया के संदर्भ में हम जिस श्रद्धाभाव से “SSDN” — श्री सतगुरु देवाय नमः लिखते हैं, उसी श्रद्धा और विश्वास के साथ वे गुरु के चरणों से जुड़े हुए थे।

मेरे साथ उन्होंने जल सेवा में भी अपना सहयोग दिया। समाज के लिए कुछ करने का हमारा एक संकल्प था। हमने साथ बैठकर कई बार समाज के लिए काम करने, जरूरतमंदों के लिए खड़े होने और लोगों के जीवन में थोड़ी-सी खुशी लाने के सपने देखे थे।

उनसे मेरा एक वादा भी था…

समाज के लिए मिलकर बहुत कुछ करना है।

आज जब वे हमारे बीच नहीं हैं, तो कभी-कभी मन में यह सवाल उठता है कि अगर सुखदेव जी आज हमारे साथ होते, तो शायद हम दोनों मिलकर कितने और काम कर चुके होते। कितने लोगों की मदद की होती, कितने चेहरों पर मुस्कान लाई होती और समाज के लिए कितने नए रास्ते बनाए होते।

लेकिन शायद जिंदगी का यही सच है…

इंसान चला जाता है, मगर उसके विचार, उसके संस्कार और उसके द्वारा दिए गए रास्ते पीछे रह जाते हैं।

सुखदेव जी मुझे हमेशा अच्छी राह दिखाते थे। जब भी किसी बात को लेकर मन में उलझन होती, उनकी बातों में एक सादगी भरी स्पष्टता होती थी। वे बड़ी-बड़ी बातें करने वाले व्यक्ति नहीं थे, लेकिन उनकी छोटी-सी बात भी कई बार बहुत बड़ा अर्थ दे जाती थी।

उनकी सबसे बड़ी खूबी यही थी कि वे इंसान को इंसान की तरह देखते थे। उनके लिए रिश्ते किसी स्वार्थ पर आधारित नहीं थे। दोस्ती में अपनापन था, सेवा में भावना थी और गुरु के प्रति श्रद्धा में विश्वास था।

आज उनकी छठी पुण्यतिथि पर उन्हें याद करते हुए मन में एक ही बात आती है—

“सुखदेव, तुम इस दुनिया से चले गए, लेकिन मेरे दिल से कभी नहीं गए।”

तुम्हारे साथ बिताया समय आज भी मेरी यादों में सुरक्षित है। तुम्हारी बातें, तुम्हारी मुस्कान, तुम्हारा साथ और समाज के लिए कुछ अच्छा करने की तुम्हारी सोच आज भी मुझे प्रेरणा देती है।

कभी-कभी लगता है कि तुम कहीं गए ही नहीं हो…

बस सामने दिखाई नहीं देते।

जब भी किसी जरूरतमंद की मदद करने का अवसर मिलता है, जब भी समाज के लिए कोई अच्छा काम करने का विचार मन में आता है, तो तुम्हारी याद जरूर आती है। ऐसा लगता है जैसे तुम आज भी कहीं न कहीं से कह रहे हो—

“चन्दर, अच्छे काम को कभी मत रोकना… लोगों के लिए करते रहना।”

शायद यही किसी सच्चे इंसान की सबसे बड़ी पहचान होती है कि उसके जाने के बाद भी उसके विचार दूसरों के जीवन में जिंदा रहें।

आज तुम्हारी छठी पुण्यतिथि पर मैं तुम्हें केवल श्रद्धांजलि नहीं दे रहा…

मैं तुम्हें एक वादा भी याद कर रहा हूँ।

समाज के लिए मिलकर कुछ करने का जो सपना हमने देखा था, उसे मैं अपनी क्षमता के अनुसार आगे बढ़ाता रहूँगा।

तुम्हारी स्मृति मेरे लिए केवल एक याद नहीं, बल्कि एक जिम्मेदारी है

आज उनकी छठी पुण्यतिथि पर उन्हें शत-शत नमन।

कुछ रिश्ते जन्म से नहीं बनते,
कुछ रिश्ते खून से नहीं जुड़े होते,
कुछ रिश्ते सिर्फ दिल से बनते हैं…
और सुखदेव जी उन्हीं रिश्तों में से एक थे।

वक्त गुजर गया…
छह साल गुजर गए…
लेकिन दोस्त, तुम्हारी याद आज भी वहीं खड़ी है,
जहाँ तुम हमें छोड़कर गए थे।

भावपूर्ण श्रद्धांजलि एवं शत-शत नमन।

— चन्दर देवानी
सहयोग एक सामाजिक संस्था

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